तेरी बातें

लफ्ज थे मेरे ..बातें थी तेरी
अधूरी सी है सांस.. तेरे बिना
खामोशी मेरी .. यादें हैं तेरी
अधूरे से हैं गीत .. तेरे बिना

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Dil Jaan 💖

जब जब भी तू याद आती है
आंखें आसूओं में डूब जाती है
और जान भी चली जाती है
पर तू क्यूं नहीं आ जाती है
देख तेरे बिन क्या हाल हुआ
मेरा दिल इतना बेहाल हुआ
चाहूं ना कुछ तेरे सिवा
तेरे सिवा हूं मैं सबसे जुदा
देजा तू मुझको अपनी चाहत
ले जा तू मुझसे मेरी मोहब्बत
चलें हम दोनो किसी ऐसे सफर
जहां ना हो कभी कोई फिकर
बस तू और मैं रहे उम्र भर
ना कोई दूजा आए उधर
फिर कर ले इक दूजे से प्यार
तुझपे लूटाऊं में सारा संसार
बस तेरी बाहों में गुजारूं सारा दिन
ना नींद रातों को आए तेरे बिन
तू जो कहे उस चांद को
देखूं कभी ना रात को
बस तेरे मुखड़े में मुझे
सारी कायनात है दिखे
तुझ बिन ऐसा है मेरा जीवन
जैसे बिन बारिश गुजरे सावन

😢

किसी की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता शायद हमारा मिलन किस्मत में नहीं था तुम स्वर्गीय हो गई और में इधर मर मर कर जी रहा हूँ मगर गलती मेरी थी

बागी

हिन्दुओं के सम्बन्ध में भी एक कटु सत्य है कि आधुनिक अर्थ में उन्हें संगठित समाज अथवा हिन्दू राष्ट्र मानना स्वप्न मात्र है! ‘हिन्दु’ शब्द स्वयं एक विदेशी शब्द है! जिसे मुसलमानों ने यहाँ के निवासियों के लिए प्रदान किया था! मुसलमानों के आगमन से पूर्व यहां के किसी ग्रन्थ में ‘हिन्दू’ शब्द नहीं मिलता! इसका एकमात्र कारण यह था कि उस समय के लोंगों द्वारा एक नाम की आवश्यकता ही नहीं समझी गई, क्योंकि उस समय उनमें यह भाव नहीं था कि वे एक समाज के अंग हैं इस प्रकार हिन्दु समाज को एक संगठित समाज नहीं माना जा सकता| वास्तव में देखा जाए तो वह जातियों का एक समूह मात्र है! इसमें प्रत्येक जाति अपने ही अस्तित्व के प्रति सजग रहती और उसकी रक्षा इसका केवल एक मात्र अन्तिम लक्ष्य है !
समुदाय में रहते हुए भी हिन्दुओं में संघ भावना नहीं पायी जाती अर्थात हिन्दु समाज को जातियों का संघ भी नहीं माना जा सकता है ! कोई भी जाति यह अनुभव नहीं करती कि दूसरी जातियों से उसका कोई संबंध है , केवल हिन्दु मुस्लिम के तनाव के समय तो सब जातियां एक हो जाती हैं बाकी हर बात में हर समय प्रत्येक जाति अपने को अलग तथा भिन्न प्रदर्शित करती हैं ये जातियां ना केवल जाति के अन्दर ही विवाह सम्बन्ध व खानपान करती हैं बल्कि बहुतों ने तो अपनी वेषभूषा भी निर्धारित कर रखी है यही कारण है कि हिन्दु ना तो संगठित समाज है और न ही राष्ट्र का ही स्वरूप बन सका है |
मेरे उपरोक्त कथन से अनेक देशभक्त सहमत नहीं होंगें अपनी देश निष्ठा के कारण वे मानने को तैयार नहीं होंगे कि भारतीय एक राष्ट्र नहीं है और उनकी स्थिति मनुष्यों की निरूद्देश्य भीड़ के समान है!
बस दो पल के लिए सब जाति भीड़ एकत्र करके एक दूसरे कि निन्दा करते हैं वो मुसलमान हो या हिन्दू
‎इतना ही नहीं हिन्दूओं में तो आज तक ऊंच नीच चलता आया है फिर क्यों ये इकट्ठे होकर दूसरे धर्म को गलत ठहराया जाता है

गुमसुम😔

रास्ता क्यूं मेरा तुझ बिन सूना रहा
कश्ती भी मेरी तुझ बिन चलती नहीं
डूबा हुआ रहता हूं यादों में तेरी
धड़कन भी मेरी तुझ बिन रूठी रही